रावतभाटा में परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ 10,000 लोगों ने कूच किया

कोटा के पास रावतभाटा में 15 जून 2012 को 10,000 लोगो ने परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ एवं स्थानीय विकास की मांग को लेकर कूच किया. चार किलोमीटर के बाद उनको रोक दिया गया. वहां पर सभा हुई. इसका आयोजन 'जन संघर्ष समिति' ने किया था जिसमे 'परमाणु प्रदुषण संघर्ष समिति' एवं अन्य लोग शामिल थे. सभी दलों का समर्थन था. कोटा के दो भाजपा विधायक भी शामिल थे.
परमाणु प्रदूषण संघर्ष समिति पिछले काफी समय से आवाज उठा रही है. कुछ महीने पहले एक काफी लम्बी मानव श्रंखला बनाई गई थी, जिसमे करीब दो हजार लोग शरीक हुए थे.
प्रमुख मांगे इस प्रकार हैं---
---- इकाई 7-- 8 का निर्माण बंद किया जाए.
---- प्रस्तावित परमाणु इंधन कोम्प्लेक्स को न बनाया जाये.
--- क्षेत्र में 2 लेन पक्की सडको का जाल बिछाया जाये ताकि दुर्घटना के समय तेजी से लोगों को हटाया जाये.
--- स्थानीय लोगो के नियमित स्वास्थ्य परिक्षण और इलाज की समुचित व्यवस्था की जाय.
--- किसानो के लिए सिंचाई की व्यवस्था की जाए.
--- स्थानीय युवकों को प्राथमिकता से रोजगार प्रदान किया जाए.
--- राणाप्रताप सागर अभयारण्य में शामिल किया जा रहे 35 गाँव को बाहर रखा जाए.
   आदि.
    इस कार्यक्रम का परचा और विडियो सलंग्न है.


सत्तावर्ग के परमाणु-किले पर जनसंघर्षों की दस्तक

कुमार सुन्दरम 
जनसत्ता में 29 सितम्बर 2011 को प्रकाशित 

अमेरिका के साथ परमाणु-करार के दौरान जहाँ देश के सत्तावर्ग ने न सिर्फ़ इसकी चौतरफ़ा हुई आलोचनाओं को दरकिनार किया बल्कि सांसदों की सरेआम खरीद-फ़रोख्त की, वहीं अब इस करार से उपजे दम्भी और विनाशकारी परमाणु सपने को जमीनी जनसंघर्शों की अदालत में जबरदस्त चुनौती मिल रही है। इस हफ़्ते तमिलनाडु में जयललिता को कूडनकुलम परमाणु बिजलीघर पर प्रधानमंत्री से वहाँ चल रहे निर्माण कार्य को लोगों की आशंकाओं के निवारण तक रोकने की मांग करनी पड़ी है. मुख्यमन्त्री की यह पहल सूबे में इस महीने चले जुझारू जनांदोलन के दबाव में आई है, जिसमें १२५ लोग कुल बारह दिनों तक भूख-हड़ताल पर बैठे रहे और पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोगों ने उनके समर्थन में शिरकत की. आंदोलन की शुरुआत में जयललिता परमाणु-विरोधियों को दिग्भ्रमित और परमाणु-परियोजना को पूर्णतः सुरक्षित बताती रहीं.

लेकिन कूडनकुलम के आम लोगों को परमाणु-बिजली और इसपर केन्द्रित विकास की सरकारी परिभाषा को लेकर कोई भ्रम नहीं है. अस्सी के दशक में इस परियोजना की शुरुआत से ही तमिलनाडु के किसानों, मछुआरा समुदाय और आम लोगों ने इसका विरोध किया है. १९८९ में इस इलाके के दस हज़ार मछुआरों ने कन्याकुमारी में प्रदर्शन किया था जिसपर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं और बर्बर दमन किया था. सोवियत रूस के पतन के बाद ऐसा लगा कि यह परियोजना अपनी मौत मर जाएगी लेकिन जब १९९८ में इसे पुनः शुरु किया गया तो स्थानीय जनता का विरोध फिर उठ खड़ा हुआ. इस बार आन्दोलन के उभार में तकनीकी दृष्टि से उन्नत माने जाने वाले जापान की फ़ुकुशिमा त्रासदी में दिखे विनाश और असहायता के अनुभव का भी योगदान रहा है. लेकिन देश के परमाणु-अधिष्ठान से लेकर केन्द्र और राज्य सरकार और मीडिया की तरफ़ से जिस तरह कूडनकुलम आंदोलन को फ़ुकुशिमा से अचानक उपजी अतिशय प्रतिक्रिया बताया जा रहा है, वह पूरी तरह गलत है. कूडनकुलम के लोगों ने १९८९ में ही न सिर्फ़ सरकार को इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करवाने पर मजबूर किया, जबकि उस जमाने में ऐसी पर्यावरणीय मंजूरियों की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं थी, बल्कि सरकार द्वारा आधे मन से तैयार उक्त रिपोर्ट का विधिवत अध्ययन और खंडन भी किया था.

परमाणु-विरोधी आंदोलन जमीनी स्तर पर उन सारे सरोकारों को एकजुट करने की सम्भावना रखता है जिनको आजकल अलग-अलग देखने का चलन है. इन सवालों के तत्कालनिर्णायक राजनीतिक हल की तलाश भी इस आंदोलन को है. ऐसे मेंयह मुद्दा अगर सबको एक कर पाए और व्यापक सामाजिक बदलाव के टूते हुए तार जोड़ पाएइसके लिए बड़े स्तर पर पहलकदमी और संघर्ष की ज़रूरत है. 

कूडनकुलम बिजलीघर रूस की मदद से बनाया जा रहा है. फ़ुकुशिमा के बाद रूस के परमाणु से जुड़े विभागों ने अपने देश के रिएक्टरों की सुरक्षा पर जो साझा रिपोर्ट रूसी राष्ट्रपति को दी है, उस रिपोर्ट में यह साफ़ कहा गया है कि रूस के परमाणु-उद्योग और उनके रिएक्टर डिजाइनों में फ़ुकुशिमा के स्तर की किसी दुर्घटना से निबटने की तैयारी का भारी अभाव है. इस रिपोर्ट में राष्ट्रपति को कुल ३१ गम्भीर कमियों की जानकारी दी गई है और VVER डिज़ाइन, जो कूडनकुलम में लगाई जा रही है, के भी खतरों को चिन्हित किया गया है. लेकिन इसके बावजूद हमारी सरकार और उसके विभागीय वैग्यानिक कूडनकुलम सहित देश के तमाम परमाणु-संयंत्रों को सुरक्षित बताते फिर रहे हैं. हमारे देश में परमाणु-संयंत्रों की सुरक्षा की निगरानी और नियमन के लिए अब तक कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है और परमाणु ऊर्जा नियमन बोर्ड (AERB) खुद परमाणु ऊर्जा विभाग के मातहत ही काम करता आया है. फ़ुकुशिमा-दुर्घटना के बाद सरकार ने परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा-जाँच और एक स्वायत्त सुरक्षा नियमन इकाई के गठन की घोषणा की थी, लेकिन इसके पीछे वस्तुतः कोई ईमानदारी नहीं बल्कि किसी तरह लोगों को शांत रखने की कोशिश ही रही है, ताकि परमाणु-कम्पनियों का भारी मुनाफ़े का सपना खटाई में नहीं पड़े. इस महीने कैबिनेट की मंजूरी के बाद लोकसभा में जारी परमाणु सुरक्षा एवं नियमन प्राधिकरण कानून की आलोचना खुद AERB के प्रमुख रह चुके डॉ. ए. गोपालकृष्णन ने की है और कहा है कि इस प्राधिकरण के अधिकार AERB से भी कम होंगे और इस पर सरकार का सीधा अंकुश बना रहेगा. कई जनसंगठनो और लोकतांत्रिक-झुकाव वाले विशेषग्यों ने भी इस प्रस्तावित कानून की आलोचना की है. फ़ुकुशिमा के बाद देश के परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा की हुई सरकारी समीक्षा का भी कमोबेश यही हाल है. किसी स्वतन्त्र जांच की बजाय परमाणु बिजली उत्पादन के लिए जिम्मेवार सरकारी कम्पनी परमाणु पावर कार्पोरेशन के स्तर पर ही जाँच को निपटा कर देश को भरोसा दिलाया गया है कि हमारे यहां सब ठीक है. इस सन्दर्भ में डॉ. ए. गोपालकृष्णन ने अपनी अध्यक्षता के समय 1995 में जारी सुरक्षा रिपोर्ट का हवाला दिया है जिसमें विशद पड़ताल के बाद परमाणु बिजलीघरों से जुड़े कुल १३४ गम्भीर खतरों की पहचान की गई थी और उन पर तत्काल कार्रवाई की मांग की गई थी. लेकिन सरकार ने कुछ करने की बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनज़र उक्त रिपोर्ट को ही गोपनीय करार दे दिया. प्रस्तावित परमाणु सुरक्षा प्राधिकरण बिल के तहत भी सरकार अपनी मर्ज़ी से किसी भी संयंत्र को राष्ट्रीय सुरक्षा के नामपर इस कानून की जद से बाहर कर सकती है, जबकि भारत-अमेरिका परमाणु करार के बाद देश के सैन्य और नागरिक परमाणु इकाईयों का साफ़ बँटवारा किया जा चुका है. साफ़ है कि परमाणु प्रतिष्ठान अबतक राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बजट से लेकर पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य तक हर मामले में जिस तरह जवाबदेही से ऊपर होने की हैसियत का मज़ा उठाता आया है, अब भी उससे अलग नहीं होना चाहता.
कूडनकुलम परियोजना पर लोगों की आपत्ति सिर्फ़ सुरक्षा को लेकर नहीं है. आन्दोलनकारियों ने इस परियोजना के हर पहलू पर गम्भीर सवाल उठाए हैं. 
कूडनकुलम परियोजना पर लोगों की आपत्ति सिर्फ़ सुरक्षा को लेकर नहीं है. आन्दोलनकारियों ने इस परियोजना के हर पहलू पर गम्भीर सवाल उठाए हैं. इलाके के लोगों में विस्थापन का भय बना हुआ है. 1991 के एक आदेश के मुताबिक संयंत्र के ढाई से लेकर पांच किलोमीटर तक के क्षेत्र को स्टरलाइजेशन ज़ोन के बतौर चिन्हित किया गया है जबकि राज्य सरकार लोगों को मौखिक आश्वासन देती रही है कि उनका विस्थापन नहीं किया जाएगा. रिएक्टरों की तीस किलोमीटर की परिधि में दस लाख से ज़्यादा की सघन आबादी है जो कि खुद AERB के मानकों से कई गुना ज़्यादा है. कूडनकुलम में प्रस्तावित रिएक्टर बिना किसी दुर्घटना के भी, सामान्य तौर पर आयोडीन-१३४, १३२, १३३, सीज़ियम-१३४, स्ट्रॉंशियम, ट्रीशियम, टेलीरियम जैसे भयावह जहर उगलते रहते हैं जिससे इलाके की हवा, फसलों, मवेशियों, समुद्र तथा भूजल में पर भारी खतरा मंदरा रहा है. संयंत्र में काम कर रहे मजदूरों, ठेकेदारों और इंजीनियरों ने खुद ही पिछले सालों में निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और दिजाइण को लेकर सवाल उठाए हैं. कूडनकुलम में कुल छह रिएक्टर लगाने की योजना है और कुछ महीने पहले तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रिएक्टर नम्बर ३-६, जो अभी योजनाधीन हैं, को तटवर्त्तीय नियमन क्षेथ के तहत आने और उनको मंजूरी नहीन देने की बात की थी. आन्दोलनकारियों ने सवाल उठाया है कि उक्त आपत्ति रिएक्टर संख्या १ और २ पर भी तो लागू होती है. इन रिएक्टरों को लेकर परमाणु दायित्व के दावे का मामला भी अभी तक सुलझा नहीं है. सरकार ने परमाणु दायित्व विधेयक संसद में पास कर चुकी है लेकिन रूसी सरकार का कहना है कि 2008 में हुए एक गुप्त समझौते के तहत भारत के रूस को खूदनकुलम के मामले में दायित्व से मुक्त रखा है और वह समझौता ही वैध होगा भारत का परमाणू दायित्व कानून नहीं. कूडनकुलम परमाणु परियोजना के आर्थिक पक्ष को लेकर भी गम्भीर सवाल उठाए गए हैं. 1988 में जब परियोजना की शुरुआत हुई थी तो इसका खर्च कुल छह हज़ार करोड आँका गया था. १९९८ में यह आकलन बढ़कर १५,५०० करोड़ हो गया और २००१ में १३,१७१ करोड़, जिसमें ६,७७५ करोड़ भारत सरकार को देना था और बाकी रूस से चार प्रतिशत की ब्याज पर कर्ज. अब दस साल के बाद इस परियोजना का वास्तविक खर्च कितना है, इसकी जानकारी लोगों को देने की कोई ज़रूरत सरकार ने उचित नहीं समझी है.

भारत उन गिने-चुने मुल्कों में है जिन्होंने फ़ुकुशिमा के बाद भी अपने परमाणु कार्यक्रम यथावत जारी रखे हैं. जर्मनी, स्वीडन, इटली, स्विट्ज़रलैण्ड जैसे कई देशों ने अपने परमाणु उद्योग को बंद करने की घोषणा कर दी है. जर्मनी की एक बड़ी ऊर्जा कम्पनी सीमेन्स ने इसी महीने परमाणु-व्यवसाय से अपनी सारी पूंजी खींच ली है. इस फैसले का असर रूस के रोज़ैटम से लेकर फांस की अरेवा कम्पनी पर भी पड़ेगा जो जैतापुर में दुनिया के सबसे बड़े रिएक्टर लगाने के आर्डर के बूते अपनी खोई आर्थिक रीढ़ वापिस पाने का सपना देख रही है. परमाणु तकनीक के अपने अनिवार्य खतरे हैं जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. फ़ुकुशिमा के बाद के महीनों में कई अन्य दुर्घटनाएं दुनिया भर में हुई हैं - फ्रांस के मारकोल में इसी महीने हुए विस्फ़ोट में एक व्यक्ति की मौत हुई और ढेरों विकिरण फैलने की खबर है. जून में अमेरिका में एक तरफ़ जहां नेब्रास्का में फ़ोर्ट कॉल्होन रिएक्टर बाढ़ की चपेट में था वहीं न्यू मेक्सिको प्रांत के जंगल में लगी भीषण आग लॉस अलामॉस परमाणु अनुसंधानकेंद्र को घेर चुकी थी जहां सैकड़ों टन परमाणु कचरा सालों से प्लास्टिक की टेंटों में पड़ा था.

जनांदोलनों की दस्तक

कूडनकुलम में दो दशक से अधिक समय से चल रहे इस आन्दोलन ने हमें दिखाया है कि विशेशग्यों की बपौती समझे जाने वाले विषयों पर आमलोग ने कैसे दखल दी है और विकास, ऊर्जा, और पर्यावरण के वैकल्पिक प्रतिमानों को अपने जीवनानुभवों के बर-अक्स गढ़ा है. यह आन्दोलन हज़ारों लोगों की सक्रिय भागीदारी के बावजूद पूर्णतया अहिन्सक रहा है जबकि सरकार झूठ और दमन का सहारा लेती रही है. देश के अन्य हिस्सों में अणुबिजली प्रकल्पों को लेकर चल रहे आंदोलनों में भी यही बात देखने को मिल रही है. जैतापुर में अवैध और झूठे मुकदमों में गिरफ़्तारियाँ, पुलिस फ़ायरिंग, कार्यकर्त्ताओं को व्यक्तिगत धमकी व प्रलोभन ही सरकार को सुहाते हैं. हरियाणा के फतेहाबाद जिले में प्रस्तावित गोरखपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना का तीस गाँवों की पंचायतों ने आमराय से विरोध किया है और वहाँ के किसान पिछले चौदह महीनों से जिला-मुख्यालय के सामने धरने पर बैठे हैं. बिना सुनवाई लगातार जारी इस संघर्ष ने तीन किसानों की जान ले ली है, लेकिन लोगों के हौसले बुलंद हैं. फतेहाबाद में उस भाखड़ा नहर के आसरे परमाणु रिएक्टर लगाए जा रहे हैं, जो इस इलाके के किसानों की खुशहाली का स्रोत है. किसी दुर्घटना की हालत में एक नहर का पानी रिएक्टरों को बुझा पाएगा, यह बात भी लोगों के गले नहीं उतरती. ऐसे ही जुझारू आन्दोलन मध्य प्रदेश के चुटका, गुजरात के भावनगर स्थित मीठीविर्डी और आन्ध्र के कोवाडा में भी चल रहे हैं. परमाणु-तकनीक से जुड़ी संवेदनशीलता अपने आसपास आमजन से कटे, निहायत गोपनीय और अलोकतांत्रिक नीति-तंत्र को जन्म देती है. परमाणु-उद्योग के समर्थन में नागरिक और मानवीय अधिकारों का दमन उस नेहरूवियन सपने पर सवाल खड़ा करता है जिसमें आज़ाद भारत में उच्च तकनीक को न सिर्फ़ देश के आधारभूत ढाँचे की रीढ़ होना था, बल्कि इस तकनीकी विकास से समाज में भी आधुनिकता, लोकतंत्र और सहिष्णुता जैसे गुणों का संचार होना था. आज जब उत्तर कोरिया और ईरान जैसे घोर अलोकतांत्रिक देश भी परमाणु-तकनीक पर दावा कर चुके हैं, हमें तकनीक और व्यापक समाज  के संबंधों की कोरी आधुनिकतावादी समझ पर पुनर्विचार करना चाहिए.

परमाणु विरोधी जनांदोलन विकास की बुनियादी समझ को लेकर सबसे तीखे और दूरगामी सवाल खड़े करते हैं. परमाणु दुर्घटना हो या इन परियोजनाओं हेतु होने वाला विस्थापन, इसकी मार भी सबसे अधिक समाज के पिछड़े तबकों पर ही पड़ने वाली है. परमाणु प्रतिष्ठान ने तकनीकी उच्चता के तर्क से अपनी संस्थाओं और उनके कामधाम को जानबूजह कर गूढ़ बना रखा है और अपने परिसरों में आरक्षण मंजूर नहीं किया है. पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेही, सरकारी नीति में पारदर्शिता, सेहत और सुरक्षा के मजदूरों के मूलभूत अधिकार, ऊर्जा और बिजली के अंधाधुध उपभोग के खतरों जैसे कई बड़े सवालों से खुद को जोड़ने की ज़रूरत जितनी शिद्दत से परमाणु-विरोधी आंदोलन करता है, उतनी व्यापकता शायद ही किसी अन्य आंदोलन की व्यावहारिक ज़रूरत हो. शायद यही वजह है कि हर विरोध को ताकपर रखने वाली सरकार को इन जनांदोलनों के सामने झुकना पड़ रहा है. कूडनकुलम की जीत तो पूरी तरह से जन-दबाव की जीत है. पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने से पहले ही ममता बनर्जी ने हरिपुर परमाणु बिजली परियोजना को निरस्त करने का वादा किया था और इस बीच परमाणु मुद्दे को लेकर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के रुख में भी बदलाव आया है. जैतापुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद तक माकपा परमाणु-विरोधी आंदोलन में शरीक है. लेकिन यह कांग्रेस के परमाणु-डील को गलत साबित करने के तर्क से निकला हुआ विरोध है या माकपा ने परमाणु-बिजली, औद्योगीकरण और विकास पर वैकल्पिक सोच की ज़मीनी जरूरत को सही में समझा है, इसकी ताकीद होनी अभी बाकी है, क्योंकि परमाणु डील के विरोध में माकपा का एक तर्क यही था कि इससे देसी परमाणु-उद्योग और उसके तकनीकी विकास को नुकसान होगा.

परमाणु-विरोधी आंदोलन जमीनी स्तर पर उन सारे सरोकारों को एकजुट करने की सम्भावना रखता है जिनको आजकल अलग-अलग देखने का चलन है. इन सवालों के तत्काल, निर्णायक राजनीतिक हल की तलाश भी इस आंदोलन को है. ऐसे में, यह मुद्दा अगर सबको एक कर पाए और व्यापक सामाजिक बदलाव के टूते हुए तार जोड़ पाए, इसके लिए बड़े स्तर पर पहलकदमी और संघर्ष की ज़रूरत है. 

कूडनकुलम में परमाणु-विरोधी अनशन

तमिलनाडू के कूडनकुलम में तेरह गावों के कुल दस हज़ार ग्रामवासी पिछले तीन दिनों से कूडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना के विरोध में भूख हड़ताल पर बैठे हैं. इस परियोजना का विरोध इस इलाके के लोग करते आ रहे हैं.

नीचे इस आन्दोलन की कुछ तसवीरें हम सहदेवन भाई के सौजन्य से दे रहे हैं - 








श्रीकाकुलम में पांच-दिवसीय परमाणु-विरोधी साइकिल यात्रा

जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) की आन्ध्र प्रदेश इकाई ने संजीवनी पर्यावरण परिरक्षण सेवा संघम (श्रीकाकुलम) और अनु विद्युत् केन्द्रम व्यतिरेक पोरता उद्यमम ने प्रस्तावित कोवाडा परमाणु बिजली प्रकल्प के 16 किमी के वृत्त में तीन से सात अगस्त 2011 तक आने वाले गावों में पांच-दिवसीय साइकिल यात्रा का आयोजन किया. अणुमुक्ति समूह से डॉ. सुरेन्द्र गाडेकर ने इस साइकिल रैली में शिरकत की.

इस रैली की तसवीरें हम नीचे दे रहे हैं. रैली की विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक करें

















"Still alive" (Mochizuki Cheshire Iori's daily report from Japan. July 31, 2011)

Thank God.I'm still alive.

Every morning ,I check my pillow if I didn't nose bleed while I was sleeping.
Today my fingers hurt. They say it's because I type too much but from reading a lot of the comments on the internet, I can't help suspecting if it's low dose symptom.

All the worst assumptions have been turning out to be true since 311. Nothing of the gov / Tepco's statement has been correct. Statement of IAEA or "experts" were not even worth of considering.

Today,here around Tokyo marked 0.2uSv/h for some reason.It's as high as when reactor 3 exploded. All the worst assumptions have been right. Something might be going on in Fukushima again though it will never be officially announced.

More people are starting to say,it's not if we should evacuate overseas or not.It's WHEN to evacuate. That's true.

I don't want to die. I want to live.God,that's all I want.



Scale 5 in Fukushima 7/31/2011 7:15AM

http://www3.nhk.or.jp/news/html/20110731/k10014583361000.html



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[Warning]

In 20km area.Pigs and Cows were left and dead.Survived ones were killed after taking these pictures.
http://blog.livedoor.jp/fuji8776/archives/52166029.html

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Anti nuc demonstration 7/23/2011 @Shibuya
http://twitpic.com/5ugh31

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Cesium 767Bq/kg detected from a junior highschool in Ito shi Shizuoka ken,which is as high as in radiation controlled area of Chernobyl.
Location;http://bit.ly/qh6IYX
http://www.city.ito.shizuoka.jp/ct/other000009200/housyanou.pdf

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Kitakyushu shi accepcted highly radioactive sewage sludge ash from Chiba→Kitakyushu shi threw 98.8% of them to the sea.
http://techpr.cocolog-nifty.com/nakamura/2011/07/988-8f59.html

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The heavyweight of Japanese actress,Yoshinaga Sayuri declared she's against nuc.
http://www.asahi.com/special/10005/OSK201107310058.html

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Exhaust air duct is damaged at Fukushima dai ni,again.
http://www.asahi.com/national/update/0731/TKY201107310088.html

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The only anti nuc government bureaucrat,Mr Koga,had his house spot blackout by Tepco 7/30/2011. It turned out that someone left dead/bloody Masked Musang in front of his house last week to threaten him.
http://gendai.net/news/view/79073

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State Oceanic Administration detected as 300times much cesium137 as average,10times much strontium90 ,and cesium134. "Western Pacific ocean is obviously contaminated by Fukushima."
http://headlines.yahoo.co.jp/hl?a=20110731-00000006-jij-int

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Radiation day.
@kazukazu721
kazukazu721

【線量】RADEX1503東京目黒区周辺、0.23!!!やっぱりおかしい。
0.23uSv/h detected in Meguroku Tokyo with the counter of RADEX1503.

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May ; Farmer,"I'm afraid of hay.Can we really feed cows with hay?"
Public officers,"Yeah,here you go."
July ; "Hay was the reason for cesium beef.Farmers were too careless",public officers.
http://blog.livedoor.jp/amenohimoharenohimo/archives/65754668.html?utm_source=twitterfeed&utm_medium=twitter

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School,hospital,private institutions in Hokkaido are avoiding Fukushima food.
They are seeking for safe food such as imported food.
http://yfrog.com/klcwwrfj

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@kittenish823
Kitten T.T.
京都も高めなのは覚悟していたが、毎時0.2μsVとなると、京都への避難や移住を考え直した方がいいかもしれない。

Even in Kyoto,they detect 0.2uSv/h.
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@yoshiyukiwatana
関川の善人迷える子羊

衆議院テレビなら削除されませんRT @sasuriya34 @hanayuu こんにちは、児玉教授の動画がもう削除されました。ブログ内動画はみれませんが、全文は読むこと出来ます。拡散願います http://bit.ly/qFVLfW

Dr.Kodama's video was already removed from everywhere.Now our fellows keep uploading.There is no reason for them to have to remove if it's a video of House of Representatives.

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The first anti nuc demonstration was held in Fukushima.
http://ryukyushimpo.jp/news/storyid-179929-storytopic-1.html

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@Pot_skyluv
Yoshiyuki
神奈川県川崎市で0.2マイクロシーベルトというtweetがあった…。 避難するか、しないか。の問題ではないと思う。いつ、避難するかの問題になってると思う…。 決断の日違いと思う…

0.2uSv/h in Kawasakishi Kanagawaken. It's not if you should evacuate or not.It's when to evacuate.

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@sakuraline
井上さくら
そうでしたか。ご存知の通り南部はセメント会社が引き取らず約3ヶ月分の焼却灰が蓄積されたまま。北部のは公共工事に使用中“@kmtchan南部です。 鶴見はまだ測ってみていませんが、同じような設備らしいので、都内の処理場に比べて大気漏れは少なめなのかもしれません。 ただ、要観察です。

Radioactive sewage sludge from South Yokohama is left for 3 months after burnt.The one from North Yokohama is used for public works.

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Cobalt 60 was detected in Kashiwa shi of Chiba.
It proves reactor 3 had an atomic explosion.
and it proves gov / tepco are still hiding most important facts.It's very natural to think there may be way more things concealed.
http://10401.blog.fc2.com/blog-entry-88.html

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Abiko elementary school in Chiba served cesium beef for school lunch (649Bq/kg)
http://www.city.abiko.chiba.jp/index.cfm/18,80986,208,728,html

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Mutated fish from Fukushima sea.
http://photozou.jp/photo/show/1157907/87676204

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[For Japanese readers]
On demand radiation map.
You request→Someone checks radiation on the demanded location.
The best localized radiation map that I've ever seen.
http://hakatte.jp/

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List of parachutist from Agency for Natural Resources and Energy to power companies.
http://ja.wikipedia.org/wiki/%E8%B3%87%E6%BA%90%E3%82%A8%E3%83%8D%E3%83%AB%E3%82%AE%E3%83%BC%E5%BA%81
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Anti nuc movement tends to be thought as left wing.→Right wing helped them having an anti nuc demonstration in Tokyo.
http://tanakaryusaku.jp/2011/07/0002708

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Seiyu sold cesium beef at 315 branches ,in 24 prefectures in total.
http://mainichi.jp/life/today/news/20110729k0000m040162000c.html

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[For Japanese readers]
Import regulations of other countries for Japanese food.(From ministry of farm.)
http://www.maff.go.jp/j/export/e_info/pdf/kensa_0715.pdf

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"Don't trust the authority"


Dear friends,
The website www.DiaNuke.org is temporarily down since last few hours due to some technical reasons. We want to believe it is just some technical glitch behind the problem.

We have been publishing an excellent Fukushima Diary by our friend and citizen journalist Mochizuki Iori who has been courageously putting up summaries from Japanese media and his picks from social media in Japan giving us a glimpse of important developments and debates. We are happy to publish his today's column on our sister website Anumukti.

Anumukti is the first anti-nuclear magazine from India, started in 1980s by veteran Gandhian scientist and  physician Surendra and Sanghamitra Gadekar. Old issues of Anumukti can be accessed here and some more recent articles by Surendra Gadekar can be read here on this site. We are thankful to Anumukti to providing us this space.




Mochizhuki Iori's Fukushima Diary - July 30, 2011


I can't understand people who still think in the paradigm of before 311.
"Getting sick,go to a doctor,doctor says it's just flu. Come home and keep getting worse."
"Believing their public announcement to say they only collect wrong information on the internet,not monitoring, and have the bots send you malware."
They have been deceiving us since 311. Exactly speaking,even since before,they kept deceiving us and pushed us to hell. I have no clue why still so many people think gov is honest and right.

It was time for us to move forward.

Gov is the liar.They are trying to kill us. Whether it's easy for you to accept or not,this is the reality.
I don't want any more people to be deceived and die.

- Mochizuki Cheshire Iori





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Minister of economy cried.
read here


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Time has come.Most of the kinds of sea food detected cesium.We can no longer eat sea food.
read here

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Japanese scientists push for more radiation tests

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Dying plants in Bunkyoku (Tokyo)
See here and here

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 Fukushima Teacher Muzzled on Radiation Risks for School Children
http://www.sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?f=/g/a/2011/07/28/bloomberg1376-LOX3C80UQVI901-6VKT39OQ368H93J37B06498CRN.DTL

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Dead puppy in 20km area,in the sitting pose.
http://stat001.ameba.jp/user_images/20110724/15/222sh555/97/67/j/t02200331_0220033111370470386.jpg

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Cesium leaf mold is distributed in Hokkaido too.
http://headlines.yahoo.co.jp/hl?a=20110730-00000018-mailo-hok

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NHK is one of the biggest stakeholders of power companies. And the power companies check if the TV programs are friendly enough for nuc.
https://twitter.com/#!/watawata52/status/97157847376343040

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NHK is the biggest stakeholder of these power companies.The sum of money is 34,000,000,000JPY
1.Tepco
2.Chubu power company
3.Kansai power company
4.Chugoku power company
5.Tohoku power company
https://twitter.com/#!/Cal215/status/97168485347627009

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The high end kind of fish,bluefin tuna,has not been tested for radiation historically.and Bluefin tuna goes all around in Japan.
Be careful to consume it.
https://twitter.com/#!/yaturada/status/97148181925736448

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Dispensary report of Hohara elementary school in Date shi,Fukushima
"Through the first term,unusually many students nose bleed,and flu prevailed even just before the summer vacation." https://twitter.com/#!/pochikorochoco/status/93664104392310785

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A part of the B/S of NHK. NHK holds 7,100,000,000 JPY of Tepco's bond.
No wonder why they manipulate the truth to broadcast.
http://www.asyura2.com/11/senkyo117/msg/360.html

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http://ajw.asahi.com/article/0311disaster/life_and_death/AJ201107295051

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http://ajw.asahi.com/article/0311disaster/fukushima/AJ201107285015

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http://ajw.asahi.com/article/0311disaster/fukushima/AJ201107295038

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New type of deceptive labeling of origins.@Supermarket chain Aeon in Ibaraki Can't read it !!!
http://twitpic.com/5wzdd6

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Hosono,The chairman of the Agency for Natural Resources and Energy in the Ministry of Economy,tried to persuade Fukui local gov to restart nuc plants by luring them with the Shinkansen project to Fukui prefecture.
http://www.asahi.com/national/update/0725/OSK201107250191.html

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@kotsukotsumam
ひまわりママ
なんで、県北の牛は2頭だけ検査?しかも、ホットスポットはずし。下野市3頭?県知事、なにやってんの!?RT@tochiginewsbot 政府、本県も出荷停止検討 2市目の牛肉基準値超え受け - 下野新聞 dlvr.it/d464P .

Tochigi prefecture is checking beef but avoiding checking beef from hot spot like Nikko.

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The only anti nuc government bureaucrat,Mr Koga had his house blackout all of a sudden.Called Tepco ,they say it's an influence of the large blackout in Yokohama,but there is no blackout in Yokohama.(I'm now writing this in Yokohama,with electricity.) 3 hours later,they finally fixed.

The fact is,ONLY his house got blackout.

長谷川幸洋(東京新聞の論説副主幹)
https://twitter.com/#!/hasegawa24
古賀さんの自宅だけ、突然、停電になったという情報がある。未確認。

東電は対応を後回しにしている模様。これは 。どういうことか? 古賀さん本人と電話で話した。以下内容。「1930ごろ、帰宅したところ、周囲の家は電気がついているのに、うちだけついていない。そこですぐ、東電に電話した。『1時間くらいで直します』という話だったが(私と話している1920現在で)復旧していない。

最初に東電に電話した後、別の横浜方面の番号で男性から電話があった。「西のほうで停電が出ているので、すぐ直せない」ということだった。だが、調べてみると「西のほう」で停電情報はない。どうなっているのか。 電力会社に詳しい経産省OBによれば「こうした場合、東電は直ちに復旧する義務がある。ところが、どうも直ちに対応していないようだ」。これは、どういうことか?

私は第一報を聞いて、すぐ「東電のテロか?」と思った。

だが、停電の原因が単なる事故なのか、それともだれかの仕業なのかは、まだ断定できない。いずれにせよ、いまから20分前の1920現在で古賀宅だけが停電しているのは間違いない。
1920でなく2120でした。

以下は時間の訂正ツイート → だが、停電の原因が単なる事故なのか、それともだれかの仕業なのかは、まだ断定できない。いずれにせよ、いまから20分前の2120現在で古賀宅だけが停電しているのは間違いない。

「横浜方面の男性からの電話」というのは、だれか?これが東電なら、東電は「西のほうの停電情報」が本当かどうか、いずれあきらかにしなければならない。どういう電話番号だったのだろうか??

いま古賀さんから二度目の電話。2150現在でまた停電中。近所はついているとのこと。やはり古賀宅だけが停電している。東電に電話したら、いま前の修理案件を直しているので、そのあとで行くとのこと。使えるのは携帯だけ。パソコンも立ち上がらない。

「横浜方面からの電話」の番号は通知になっているとのことなので、後で調べがつく。東電は事態をしっかり説明すべき。

携帯電話のバッテリーがアウトになったら、連絡もつかなくなるので、古賀さんからの電話は早々に切りました。

石川和男
https://twitter.com/#!/kazuo_ishikawa/status/97286482640896000
今、東電のホームページを見てますが、私が見る限りでは、豪雨による停電などは見当たりません。

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@ei_es
えい☆えす (原発被害で岐阜県に避難中)
新潟には福島から阿賀野川が流れ込んでいるので、その影響が大きいのではないでしょうか。RT:@KinositaKouta 新潟市沖のマダイの内臓から、セシウムが21Bq/kg検出。日本海側の魚の検出はひょっとしてはじめてなのかな。ここまできたか。

Radiation even leaks to Japan sea via river.Pagrus major from Japan sea detected 21Bq/kg cesium

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Yellow bruise on the leg of 16 years old boy.
http://photozou.jp/photo/show/1627445/87770021

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Dead cows in 20km area,including 90 pigs. Rotten and liquefied dead bodies,scattered bones,stench of death. Gov asked the farmer to sign on the paper because they destroyed the cows.

However,nobody's sure if they killed them properly or they simply died of starvation or killed by wild dogs.
Anyway,the farmers' loved animal family turned to be the dead bodies.
http://ameblo.jp/gashi-kachiku-kyuusai/entry-10929974317.html

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Sudden bruise for no reason.Hurts.Gets worse day after day. 15 years old girl in Yokohama.
http://photozou.jp/photo/show/1887316/91059687

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Sudden eczema on 0 year old baby's face. Feverish.
http://photozou.jp/photo/show/1469243/90774538

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Explosion of reactor 3 in 3/14/2011. It was told to be a hydrogen explosion at first but it turned out to be atomic explosion.
http://www.youtube.com/watch?v=T_N-wNFSGyQ

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@Happy20790
ハッピー

続き2:1号機は線量高くて1人が30分位しか作業出来ないから大変なんだ。機材は階段で運ばなきゃだし…脚がパンパンでし。物を運ぶのは誰でも運べるんだけど、溶接技術者や管理者が少ないからこれから先が大変なんだよなぁ…。

Tweet of an actual Fukushima worker, Unit 1 is too radioactive.One engineer can work only for 30 mins.No power in it.need more engineers.
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Radiation spread "simulation" program SPEEDI is still concealed. We need to spam cabinet and ministry of culture. Here are the forms to send messages.
https://www.kantei.go.jp/jp/forms/goiken_ssl.html
https://www.inquiry.mext.go.jp/inquiry29/

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[For Japanese readers]
Nuc slaves.
http://www.jca.apc.org/mihama/rosai/elmundo030608.htm

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सरकारी घोषणा

19 जुलाई 2011. रावतभाटा। परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. एसके बनर्जी ने कहा कि जापान के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में सुनामी से फैली विकिरण त्रासदी के बाद जर्मनी, इटली और स्विटजरलैण्ड में न्यूक्लियर कार्यक्रम बंद करने का फैसला पूरी दुनिया का फैसला नहीं हो सकता। भारत में 40 फीसदी आबादी आज भी बिजली से महरूम है। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को अपनाए बगैर हम दुनिया के साथ खड़े नहीं हो सकते। भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम जारी रहेगा। बनर्जी सोमवार को राजस्थान परमाणु बिजलीघर की 700-700 मेगावाट की सातवीं-आठवीं इकाई के प्रथम पोर क्रंकीट कार्य का शिलान्यास करने के बाद विजय भवन में बिजलीघर के कर्मचारियों व अधिकारियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड परमाणु कार्यक्रम के हर पहलू की समीक्षा के साथ नजर रख रही है। संसद में शीघ्र ही परमाणु दायित्व बिल को संसोधन के साथ पेश किया जा रहा है। भविष्य की ऊर्जा जरूरत को देखते हुए नाभिकीय व सौलर दो विकल्प हैं। खपत व उत्पादन के बीच अंतर को हम केवल नाभिकीय ऊर्जा से समाप्त कर सकते हैं। नाभिकीय ऊर्जा पर्यावरण हितैषी है, जो देश की उन्नति में सहायक होगी। हम पूरी तरह सुरक्षित नाभिकीय ऊर्जा निगम के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. एस. के. जैन ने कहा कि रावतभाटा साइट के रिएक्टरों को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि गांधीसागर बांध टूट जाए और उसी दौरान मुम्बई की तरह तेज बारिश हो तब भी शटडाउन नहीं होगा। हम पूरी तरह सुरक्षित हैं।(स्रोत-पत्रिका.कॉम)

जैतापुर: फुकुशिमा के सबक सीखने से इन्कार


(1)
28 मार्च 1979 को अमेरिका के पेनसिल्वानिया इलाके में थ्री माइल आइलैण्ड में परमाणु हादसा हुआ। बीस मील के दायरे में रहने वाली करीब 6 लाख आबादी की से इलाका खाली करवाया गया। हादसे में हुई मौतों पर कोई अधिकृत विश्वसनीय बयान भले न दिया गया हो लेकिन परमाणु संयंत्र के नजदीक रहने वाली आबादी में अनेक खतरनाक बीमारियों के बढ़ने की अनेक गैर सरकारी रिपोर्टें आयी हैं। परमाणु विकिरण युक्त 40 हजार गैलन पानी को नजदीकी नदी में छोड़ देने पर अमेरिकी प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की जनता में खूब थू-थू हुई। अमेरिका भी परमाणु सुरक्षा के मामले में अपनी अचूक व्यवस्था का भरपूर दम भरता था। थ्री माइल आइलैण्ड के परमाणु हादसे के बाद अमेरिका ने अपने मुल्क में कोई नया परमाणु संयंत्र नहीं लगाया।

(2)
चेर्नोबिल हादसे को इस वर्ष की 26 अप्रैल को 25 वर्ष हो गए। तत्कालीन सोवियत संघ के उक्रेनियन गणराज्य में हुए उस हादसे में कितने लोग मारे गए, इसके आँकड़े आश्चर्यजनक हद तक विरोधाभासी हैं। कुछ सूत्र चेर्नोबिल के हादसे से मात्र 31 लोगों की मौत हुई मानते हैं, कुछ तीन से चार हजार और कुछ के मुताबिक चेर्नोबिल से हुए रेडिएशन की वजह से 1986 से 2004 के बीच 9 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। रेडिएशन से प्रभावित करीब सवा लाख हेक्टेयर जमीन को हादसे के बाद से अब तक, और आगे भी न जाने कितने वर्षों तक के लिए किसी भी तरह की जैव उपस्थिति के लिए खतरनाक घोषित कर दिया है।
चेर्नोबिल दुनिया के अति सुरक्षित कहे जाने वाले परमाणु संयंत्रों में से एक था। सोवियत संघ की आपातकालीन सुरक्षा का आलम ये था कि संयंत्र के पास मौजूद समूचे प्रिपयात शहर की आबादी को उन्होंने महज कुछ ही घंटों के भीतर खाली करवा लिया था।

(3)
और सन् 2011 की 11 मार्च को जापान में सूनामी और भूकंपों की तबाही झेल रहे जापान को फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में दुर्घटना का कहर झेलना पड़ा। जापान में इसका इंसानों के जीवन और स्वास्थ्य पर कितना असर हुआ है, ये तथ्य तो अभी बाहर नहीं आये हैं। जो जानें गयीं, उनमें कितनों के लिए भूकंप को, कितनों के लिए सूनामी को और कितनों के लिए परमाणु हादसे को जिम्मेदार माना जा सकता है, ये एक अलग ही कवायद है। लेकिन इतना तो स्थापित हो ही गया कि जापान, जो धरती और समंदर की करवटों और मिजाज को बहुत अच्छे से जानता है और जिसकी सुरक्षा व्यवस्था भी विश्व के अन्य विकसित देशों से कम नहीं थी, वो भी अपने परमाणु संयंत्र को दुर्घटना से नहीं बचा सका।
......
अमेरिका, सोवियत संघ और जापान - तीनों ही देश तकनीकी और विज्ञान के मामले में दुनिया के अग्रणी और अत्यंत सक्षम देशों में से हैं। तीनों ही देशों में श्रेष्ठ तकनीकी, श्रेष्ठ वैज्ञानिक और राज्य की पूरी मशीनरी का साथ होने के बावजूद परमाणु संयंत्रों में दुर्घटनाओं को टाला नहीं जा सका।
अन्य देशों की प्रतिक्रियाएँ और फ्रांस की फुकुशिमा के हादसे के बाद तो पोलैण्ड, इटली, स्विट्जरलैण्ड, जर्मनी सहित दुनिया के अनेक देशों ने अपने देशों में प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को स्थगित कर दिया है। अकेले योरप में ही सब मिलाकर करीब 150 रिएक्टर हैं जिनमें से आधे बिजली बनाने के काम में आते हैं। स्विट्जरलैण्ड ने अपने उन पाँच रिएक्टरों को बदलकर नये रिएक्टर लगाने का निर्णय रोक लिया है जिनकी उम्र पूरी हो गई थी। इटली चेर्नोबिल हादसे के बाद से ही परमाणु ऊर्जा से तौबा किये बैठा है। उसने अपना आखिरी परमाणु रिएक्टर भी 1990 में बंद कर दिया था। हालाँकि अपनी ऊर्जा जरूरतों का 10 प्रतिशत अभी भी वो परमाणु ऊर्जा से पूरा करता है लेकिन वो ऊर्जा वो खुद न पैदा करके आयात करता है। वैसे इटली भी वापस परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के बारे में पुनर्विचार कर ही रहा था लेकिन जापान के हादसे ने उन विचारों को भी स्थगित कर दिया। योरप में आॅस्ट्रिया परमाणु ऊर्जा से पूरी तरह मुक्त देश है लेकिन इससे वो सुरक्षित होने का भ्रम नहीं पाल सकता। आस-पड़ोस के देशों के परमाणु संयंत्रों में होने वाली दुर्घटना का असर वहाँ पड़ेगा ही पड़ेगा। इसलिए आॅस्ट्रिया सभी देशों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि वो परमाणु ऊर्जा के विकल्प की तलाश करें न कि परमाणु ऊर्जा के विनाशकारी स्वरूप को कम करके आँकने की।

हाँ, फ्रांस की प्रतिक्रिया जरूर इन सब की तुलना में अधिक ढुलमुल रही। फ्रांस, दरअसल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका के बाद षिखर पर दूसरे सर्वोच्च स्थान पर है। उसके पास 19 परमाणु संयंत्र हैं जिनमें 58 रिएक्टर काम करते हैं और उनसे फ्रांस की करीब 80 प्रतिशत ऊर्जा पैदा होती है। इस रास्ते पर सरपट दौड़ रहे फ्रांस के साथ ऐसा नहीं है कि वहाँ कभी कोई परमाणु दुर्घटना न घटी हो। स्तर 4 की दो बड़ी परमाणु दुर्घटनाएँ वहाँ 1969 और 1980 में घट चुकी हैं। उनके अलावा भी 2008 में एक ही हफ्ते में दो बार अरेवा के ही परमाणु संयंत्रों में यूरेनियम रिसाव की दुर्घटनाएँ हुईं। एक बार तो यूरेनियम टब से निकलकर भूजल में जाकर मिल गया और दूसरी बार पाइप फटने से यूरेनियम रिसाव हुआ। जाँच अधिकारियों ने पाया कि पाइप बरसों पुराना था और उसका लगाा रहना लापरवाही का नतीजा था। अरेवा के अधिकारियों ने माना कि गलती पकड़े जाने से पहले तक उससे 120 से 750 ग्राम यूरेनियम का रिसाव हो चुका होगा। इसी तरह दूसरे मामले में यूरेनियम का रिसाव हुआ और वो पास की दो नदियों और भूजल में जाकर मिल गया। परमाणु सुरक्षा विशेषज्ञों ने तत्काल दोनों नदियों और आसपास के कुओं के पानी का उपयोग बंद करवाया। खेतों में पौधों को पानी देना भी बंद कर दिया गया। खुद अरेवा कंपनी ने इस दुर्घटना को गंभीर मानते हुए अपने प्लांट डाइरेक्टर को नौकरी से हटा दिया लेकिन आधिकारिक तौर पर उसने इसे स्तर 1 की परमाणु दुर्घटना मानने पर जोर दिया और कहा कि इससे किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। हालाँकि दुर्घटना के स्तर का सही संदर्भ यह जानने पर बनता है कि स्तर 1 की दुर्घटनाएँ फ्रांस में 2006 में 114 हुई थीं और 2007 में 86।

परमाणु संयंत्र बनाने, यूरेनियम उत्खनन करने, परमाणु कचरे को ठिकाने लगााने आदि में वहाँ की अरेवा कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। अरेवा कंपनी की मालिक फ्रांस की सरकार है। भारत में पिछले दिनों आये फ्रांस के राष्ट्रपति ने घूमने-फिरने, हाथ मिलाने, राजनयिक भोजन करने के अलावा जो एक काम पूरी मुस्तैदी से किया था, वो था अरेवा कंपनी द्वारा महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जैतापुर परमाणु संयंत्र के लिए परमाणु रिएक्टर अरेवा की ओर से तैयार करने का करार। बेशक तब तक फुकुशिमा नहीं हुआ था, लेकिन चार साल से जैतापुर क्षेत्र के लोग तो उस परमाणु परियोजना का विरोध कर ही रहे थे। विरोध और भी स्तरों पर जारी था। दिल्ली में हस्ताक्षर अभियान चला, वामपंथी सांसदों ने मामला उठाया। एक स्वतंत्र दल ने वहाँ के लोगों से मिलकर और परियोजना के तकनीकी पहलुओं को लेकर एक रिपोर्ट जनता के बीच प्रसारित की। फिर फुकुशिमा हुआ। भारत सरकार ने जापान के लिए संवेदनाएँ इत्यादि प्रकट करने के बाद कहा कि जैतापुर परमाणु संयंत्र किसी भी हालत में नहीं रुकेगा।

जैतापुर में विरोध क्यों?

फुकुशिमा के हादसे के बाद भी भारत सरकार जैतापुर में 10000 मेगावाट क्षमता वाला परमाणु संयंत्र लगाने के निर्णय पर पुनर्विचार करने को भी तैयार नहीं है। एक ही स्थान पर स्थापित होने वाला ये दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र होगा। जल्दबाजी में, बगैर जरूरी जानकारियों को इकट्ठा और विश्लेषित किये ये परमाणु ऊर्जा संयंत्र वहाँ के ग्रामीण निवासियों पर थोप दिया गया है। पहले तो स्थानीय लोगों को कुछ हजार रुपये प्रति एकड़ का मुआवजा लेकर टरकाना चाहा लेकिन जब स्थानीय लोगों ने जमीन छोड़ने से इन्कार किया तो मुआवजे की राशि बढ़ाकर पिछले साल 4.5 लाख रुपये और बाद में 10 लाख रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ा दी गयी, लेकिन प्रभावितों में से इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ किसी ने मुआवजा नही लिया। दूसरी तरफ अधिकारी ये दोहराते रहे कि वो जमीन तो बंजर है, खाली पड़ी है और 50-60 प्रतिशत जमीन का तो कोई दावेदार भी नहीं है, इसलिए परियोजना निर्माण में कोई बाधा नहीं है। सरकार की एक एजेंसी द्वारा किये गए एक अध्ययन के बाद कहा गया कि वहाँ मछुआरों का कोई गाँव ही नहीं है जबकि जब विरोध करने वाले लोगों पर पुलिस दमन हुआ तो वो मछुआरों के गाँव सखरी नाटे में ही हुआ, जो आदमी मारा गया, वो भी मछुआरा ही था।

परियोजना से प्रभावित होने वाले सभी गाँवों की ग्राम पंचायतों ने बाकायदा प्रस्ताव पारित करके परियोजना का विरोध किया है और वहाँ के लोग पिछले पाँच बरसों से अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीकों से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। कुछ परिवारों को छोड़कर बाकी लगभग सभी परिवारों ने सरकार द्वारा दिये जा रहे मुआवजे को नहीं लिया है फिर भी राष्ट्रीय हित का बहाना लेकर सरकार ने उनकी जमीनों पर भूमि अधिग्रहण कानून के अनुच्छेद 17 का इस्तेमाल करके आपातकाल प्रावधान के तहत परियोजना के लिए लोगों की 953 हेक्टेयर कब्जा कर लिया है। लेकिन लोगों के विरोध और उनके सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रही है। इस परियोजना के पहले जो अध्ययन होने चाहिए थे, वो पूरे होने के पहले, और आसपास के जनजीवन, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों पर परमाणु ऊर्जा के होने वाले असरों को जाँचने के पहले ही जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया। इसमें उन लोगों का कोई ध्यान भी नहीं रखा गया जो जमीनों के मालिक भले न हों तो भी जिनका जीवन मुख्य रूप से मछलीपालन जैसी समुद्र से जुड़ी हुई गतिविधियों पर निर्भर रहता है। बेशक परियोजना के स्थानीय विरोध की वजह लोगों की परमाणु ऊर्जा के खतरों के बारे में जागरूकता नहीं, बल्कि उनका सरकारी वादों के प्रति संदेह और अपनी आजीविका के उजड़ने का खतरा प्रमुख रहा होगा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उससे आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा के सर्वग्रासी और भस्मासुरी स्वरूप की भी जानकारी हासिल कर ली है। पिछले 4-5 वर्षों से जैतापुर के आसपास के लोग जाकर तारापुर के पड़ोसी गाँवों के निवासियों से मिल रहे थे और जानकारियाँ ले रहे थे उनसे जो खुद लगभग 50 बरस पहले के भुक्तभोगी रहे हैं। तारापुर वालों के बताये वो जानते हैं कि जो सरकार बिजली बनाने और फिर सस्ती बिजली देने का झुनझुना उन्हें पकड़ा रही है वो तारापुर में भी कर चुकी है और तारापुर के आसपास रह रहे लोगों को अभी भी 8-8 घंटे की बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। तारापुर प्रभावितों ने उन्हें सरकारी भ्रष्टाचार से तो आगाह किया ही, साथ ही आजीविका के साधनों पर परमाणु ऊर्जा के पड़ने वाले असरों के बारे में भी बताया कि किस तरह तारापुर संयंत्र से समुद्र में मिलाये जाने वाले पानी ने मछलियों की उपलब्धता को काफी हद तक घटाया है, लोगों में चर्मरोग व अन्य बीमारियाँ फैली हैं.... और उनमें से कोई जनता की मदद करने नहीं आया जो पहले जमीन लेने के लिए मान-मनुहार कर रहे थे।
प्रस्तावित जैतापुर परमाणु संयंत्र से प्रभावित गाँवों के लोग अब ये जानते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के असर सिर्फ जमीन पर ही नहीं, हवा और पानी पर भी होते हैं और कई पीढि़यों तक खत्म नहीं होते। इन्हीं सब चीजों को जानते-समझते लोगों का विरोध लगातार जारी रहा। अनेक बार छुटपुट मुठभेड़ें भी हुईं लेकिन प्रधानमंत्री के बयान से पुलिस-प्रशासन को जैसे जैतापुर से परमाणु ऊर्जा विरोधियों को खदेड़ने की हरी झण्डी मिल गयी। दमन तेज हुआ और 18 अप्रैल 2011 को एक मछुआरे तबरेज सयेकर की पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई। वो 600-700 लोगों की उस भीड़ का हिस्सा था जो जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र का विरोध करने के लिए सखरी नाटे गाँव में इकट्ठा हुई थी। वो महज मछुआरा था, उसकी कोई जमीन नहीं जा रही थी। गाँववालों का और उसके परिवारवालों का इल्जाम है कि पहली गोली जब उसे लगी तब वो जीवित था और पुलिस ने उसे अस्पताल ले जाते समय रास्ते में मारा। उसे दिल, जिगर और किडनी के पास तीन गोलियाँ लगीं पायी गयीं।

उसके बाद भी सरकार का अडि़यल रवैया जारी रहा। देशभर में हो रहे विरोध की परवाह न करते हुए 23 अप्रैल 2011 को परमाणु संयंत्र के विरोध में तारापुर से जैतापुर यात्रा को पुलिस ने रोक दिया और लोकतांत्रिक तरीके से शान्तिपूर्ण विरोध कर रहे यात्रा में शामिल वैज्ञानिकों, पूर्व न्यायाधीशों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। करीब 200 लोगों के इस यात्रा जत्थे में भारतीय सेना के पूर्व एडमिरल एल. रामदास, मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बी. जी. कोल्से पाटिल, जस्टिस पी. बी. सावंत, इंजीनीयर व वैज्ञानिक अशोक राव, सौम्या दत्ता, सामाजिक कार्यकर्ता गैब्रिएला डाइट्रिच, एडवोकेट मिहिर देसाई, प्रोफेसर बनवारीलाल शर्मा, वैशाली पाटिल, पत्रकार ज्योति पुनवानी, मानसी पिंगले समेत अनेक मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता शामिल थे। इन लोगों को जैतापुर तक नहीं जाने दिया गया। ये जिन बसों में जा रहे थे, उनके मालिकों को डराया धमकाया गया जिससे बस ड्राइवर बीच रास्ते में ही इन यात्रियों को छोड़ भाग निकले। एडमिरल एल. रामदास की अपील पर जैतापुर परियोजना को रद्द करने की माँग लेकर हजारों फैक्स प्रधानमंत्री कार्यालय को किए गए। लेकिन वरिष्ठ नागरिकों, वैज्ञानिकों और परमाणु ऊर्जा का अमनपूर्वक विरोध कर रहे लोगों की आवाज को भारत सरकार ने आसानी से अब तक अनसुना किया हुआ है।

सवाल केवल पर्यावरण या लोगों की आज की आजीविका या मुआवजे भर का ही नहीं है। परमाणु संयंत्र के साथ सुरक्षा और खतरों के दीर्घकालीन मुद्दे जुड़े होते हैं। परमाणु ऊर्जा बनाने के पहले उससे बनने वाले कचरे के इंतजाम की योजना बनानी जरूरी है। जो संयंत्र लगाया जा रहा है उसे सुरक्षा के पैमानों पर पूरी तरह से जाँचना जरूरी है और सबसे जरूरी है कि जिन लोगों को विस्थापित किया जा रहा है उन्हें पूरी जानकारी हांे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी सहभागिता हो। जैतापुर के मामले में सब कुछ उल्टे तरीके से किया जा रहा है। फ्रांस की जिस ‘अरेवा’ कंपनी के बनाये संयंत्र को जैतापुर में स्थापित करने की कवायद की जा रही है, उसकी डिजाइन को सार्वजनिक नहीं किया गया है जबकि उसी तरह के उसी कंपनी के बनाये संयंत्रों पर योरप और अमेरिका की सरकारी एजेंसियों ने सवाल उठाये हैं। जैतापुर संयंत्र की मौजूदा अनुमानित लागत 328.6 अरब रुपये बतायी जा रही है जो परियोजना बनने तक और भी बढ़ जाएगी। परमाणु ऊर्जा के सवाल पर गोपनीयता का बहाना अपनाया जा रहा है। ये अब तक नहीं बताया जा रहा है कि इससे बनने वाली ऊर्जा की लागत क्या होगी, किस कीमत पर उसे बेचा-खरीदा जाएगा, किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में संयंत्र निर्माता कंपनी की और सरकार की जिम्मेदारियाँ क्या होंगी, अपराध निर्धारण के क्या प्रावधान होंगे, आदि ऐसे सवाल जिनसे लोगों को पता चले कि परमाणु ऊर्जा वाकई उनके लिए व पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है या फायदेमंद! और अब तो संसद ने न्यूक्लियर लाएबिलिटी विधेयक भी पारित कर दिया है जिससे किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में परमाणु संयंत्र सप्लाइ करने वाली कंपनी को नहीं बल्कि देश के भीतर उसका संचालन करने वाली कंपनी को जिम्मेदारी भुगतना होगी जो भारत में एन.पी.सी.आई.एल. है। भारत में परमाणु संयंत्रों को चलाने के लिए 1987 में एन.पी.सी.आई.एल. या न्यूक्लियर पाॅवर काॅपोरेशन आॅफ इंडिया लि. नाम की कंपनी बनायी गई। कहने को तो ये भारत सरकार की पब्लिक सेक्टर कंपनी है लेकिन जैसे सरकार भी कहने भर के लिए भारत सरकार कहलाती है, काम तो वो अमेरिकी हितों के ही करती है, वैसे ही ये कंपनी भी कहने भर को सार्वजनिक उपक्रम है, काम तो उसका भी अन्य काॅर्पोरेट कंपनियों की ही तरह मुनाफा कमाना है।

एनपीसीआईएल बनाने के भी पहले भारत सरकार ने 1983 में एक परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड बनाया था जिसका मुख्य कार्य परमाणु ऊर्जा से ताल्लुक रखने वाले मसलों में नियमन व सुरक्षा के पहलुओं पर नजर रखना है। इस बोर्ड के नब्बे के दशक के मध्य में अध्यक्ष रहे डाॅ. ए. गोपालकृष्णन ने जैतापुर के परमाणु संयंत्र के असुरक्षित होने के बारे में अपनी चिंताएँ प्रकट करते हुए फरवरी 2011 में एक लेख के जरिए ये सवाल उठाये कि जब भारत में बने प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर की लागत आज के मूल्य के मुताबिक करीब 8 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की है तो भारत सरकार फ्रांस की अरेवा कंपनी से योरपियन प्रेशराइज्ड रिएक्टर क्यों खरीद रही है जिसका दुनिया में न तो अब तक कहीं परीक्षण हुआ है और जिसकी लागत भी 20 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट पड़ेगी।

इसके जवाब में एनपीसीआईएल की ओर से डाॅ. गोपालकृष्णन का मखौल उड़ाते हुए जवाब दिया गया कि दुनिया में बहुत सारी जगहों पर ऐसे रिएक्टर लगे हैं जिनका पूर्व में कोई परीक्षण नहीं हुआ था। खुद भारत के ऐसे अनेक रिएक्टरों की मिसाल उन्होंने दी। उन्होंने कहा कि रिएक्टर जब तक लगेगा नहीं तब तक उसका परीक्षण कैसे होगा।

एनपीसीआईएल जैसी विशेषज्ञों-वैज्ञानिकों से भरी पड़ी कंपनी से एक आम नागरिक के तौर पर कोई भी ये जानना चाहेगा कि क्या परीक्षण के लिए थोड़ी कम क्षमता वाले रिएक्टर से काम नहीं चल सकता था जो सीधे दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र (10000 मेगावाट) परीक्षण के लिए भारत ले आए? या क्या अरेवा कंपनी के अपने देश फ्रांस में इसके परीक्षण के लिए कोई जगह नहीं बची थी? या बहादुरी के मामले में भारत को ऐसी कोई मिसाल कायम करके दिखानी है कि देखो, हम दुनिया का सबसे बड़ा अ-परीक्षित परमाणु संयंत्र लगाने की भी हिम्मत रखते हैं !

भारत में परमाणु दुर्घटना क्यों नहीं हो सकती???
भारत में 20 परमाणु संयंत्र काम कर रहे हैं और पाँच निर्माणाधीन हैं। सरकार कितनी तेजी से परमाणु ऊर्जा के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है , ये इससे स्पष्ट है कि उसके पास भविष्य के लिए 40 रिएक्टरों की योजनाएँ व प्रस्ताव मौजूद हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी किस्म की विकसित की गई तकनीक के साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में जो भी कदम बढ़ाये थे, वे पिछले दौर में अमेरिका के साथ किये गए 123 समझौते के साथ पिछड़ गए हैं। अब हम एक तरह से मजबूर हैं कि हमारे वैज्ञानिक दूसरों के इशारों पर काम करें। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने फ्रांस, आॅस्ट्रेलिया, स्वीडन और रूस के साथ ये करार किया है कि भारत इन चारों देशों से 10-10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर खरीद कर अपने देश में स्थापित करेगा। ये हमारे देश की नयी विदेश नीति का नतीजा है जो हमारे सत्ताधीशों ने साम्राज्यवादी ताकतों के सामने गिरवी रख दी है। फ्रांस की अरेवा कंपनी से लिये जाने वाले 10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर उसी करार की नतीजा है।
जब हम अपनी जानी-पहचानी, घरेलू तौर पर विकसित की गई तकनीक के साथ काम करते थे तब भी मानवीय भूलें होती थीं। अब एक अपरीक्षित और अपरिचित मशीन हमारे वैज्ञानिक सँभालेंगे तो गलतियों की गुंजायश भी ज्यादा हो सकती है। पहले भी भारत में राजस्थान के परमाणु संयंत्र में 1992 में 4 टन विकिरणयुक्त पानी बह गया था और तारापुर में भी 1992 में 12 क्यूरीज रेडियोध्र्मिता फैली थी।
तो भारत के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है जिससे इस देश के उच्च शिक्षित प्रधानमंत्री ये दावा करते हैं कि भारत के जैतापुर परमाणु संयंत्र में ऐसी कोई दुर्घटना कभी नहीं घटेगी, इसलिए संयंत्र का काम आगे बढ़ाना चाहिए।

विशेषज्ञों की दिव्य बातें
जाहिर है ऐसा विश्वास प्रधानमंत्री को उनके विशेषज्ञ ही दिला सकते हैं। जैतापुर परमाणु संयंत्र से जुड़े एक भौतिकविद् और कोल्हापुर के डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय के कुलपति । डॉ. एस. एच. पवार ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि जापान में 8.9 तीव्रता का जो भूकंप आया था, उससे सूनामी की लहरें पैदा हुईं लेकिन भूकंप से फुकुशिमा के परमाणु संयंत्र का कुछ नहीं बिगड़ा। परमाणु संयंत्र में जो विस्फोट हुआ, वो पानी के रिएक्टर में घुस जाने की वजह से जो बिजली गुल हुई और उससे जो परमाणु ईंधन को ठंडा करने का जो सिस्टम था, वो फेल हो गया, इसलिए विस्फोट हुआ।

दूसरी दिव्य ज्ञान की बात उन्होंने ये बतायी कि जैतापुर समुद्र की सतह से करीब 72 फीट की ऊँचाई पर है जिससे अगर कभी महाराष्ट्र में सूनामी आती भी है तो ‘उनके ख्याल से’ वो इतनी ऊँचाई पर नहीं पहुँच पाएगी।
तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने ये कही कि भारत को परमाणु विकिरणों से निपटने की तैयारी को तेज करना चाहिए। हमें ऐसे लोग तैयार करने चाहिए जो परनाणु विकिरणों से पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपट सकें। डाॅ. पवार ने ये भी बताया कि इसके लिए उनके विश्वविद्यालय ने अभी से ही कोर्सेस भी खोल दिए हैं।

डाॅ. पवार के ये कथन किसी और व्याख्या की जरूरत नहीं छोड़ते। इन्हें पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि चूँकि फुकुशिमा में रिएक्टर में विस्फोट भूकंप से नहीं हुआ बल्कि भूकंप से जो सूनामी उठी और सूनामी से जो पानी घुसा और उससे जो बिजली की आपूर्ति में रुकावट आयी, उससे विस्फोट हुआ। और इसीलिए भले ही जैतापुर में भूकंप आयें लेकिन यहाँ ‘डाॅ. पवार के ख्याल से’ कभी सूनामी तो आएगी नहीं इसलिए यहाँ कभी बिजली आपूर्ति अवरुद्ध नहीं होगी और इसीलिए यहाँ कभी विस्फोट भी नहीं होगा। ऐसा लगता है कि सूनामी ने तो जैसे डाॅ. पवार से ही वादा किया है कि वो 72 फीट ऊँचाई तक कभी नहीं आएगी। डाॅ. पवार के इंटरव्यू से ऐसा भी लगता है कि वैसे कोई दुर्घटना कभी होगी नहीं लेकिन फिर भी अगर कुछ गड़बड़ हो ही जाती है तो विकिरण प्रभावितों का इलाज और देखभाल करने वाले लोगों को प्रशिक्षण देने के नये कोर्सेस विश्वविद्यालय ने चालू कर ही दिए हैं। डाॅ. पवार के इन अत्यंत बुद्धिमानीपूर्ण कथनों को एनपीसीआईएल ने अपनी वेबसाइट पर एक बयान की तरह चस्पा कर रखा है।

खुद सरकारी भूगर्भीय सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि जैतापुर भूकम्प संवेदी इलाके में मौजूद है और गुजरे 20 वर्षों में इस क्षेत्र में 92 छोटे-बड़े भूकंप आ चुके हैं। और फिर भारत के जो राजनेता हैं, जो ठेकेदार हैं, जो अफसरशाही है, वो क्या किसी से कम है? जो खेल के सामान में, जेल के सामान में, फौज के सामान में, पुल के, सड़क के, दवाई के, पानी के या किसी भी क्षेत्र में कमीशन लेकर घटिया सामान चलवा सकते हैं, जो जमीन पर ही नहीं, आकाशीय स्पेक्ट्रमों में भी और खेतों में ही नहीं गोदामों में भी भ्रष्टाचार की पताका फहरा सकते हैं, वे जैतापुर में भला क्यों नहीं ऐसा करेंगे। और अगर किया तो क्या वो हादसा किसी पुल या पानी की टंकी के गिर जाने जितना ही कहा जा सकता है?

कचरा भी खतरा
परमाणु ईंधन से अगर आपने बिजली बना भी ली तो भी परमाणु ईंधन के बाद बचने वाले कचरे को ठिकाने की समस्या तो फिर भी बनी ही रहती है। अप्रैल, 2010 में अमेरिकी राष्ट्रति बराक ओबामा ने जाॅर्ज बुश के जमाने से चले आ रहे इस तर्क का इस्तेमाल 47 देशों के वाशिंगटन परमाणु सम्मेलन में किया कि परमाणु हथियारों के आतंकवादी समूहों के हाथ लग जाने का खतरा सबसे बड़ा है। हालाँकि जाॅर्ज बुश ने किसी एक मौके पर देशवासियों के नाम संदेश में आतंकवाद के साथ-साथ परमाणु कचरे को भी मानवता और अमेरिका के लिए बड़ा संकट बताया था। ओबामा ने परमाणु खतरे के संकट का जिक्र भले टाल दिया लेकिन उससे संकट कहीं भी टला नहीं है। बल्कि अमेरिका में नेवादा इलाके में जहाँ परमाणु कचरे को युक्का पर्वत के नीचे दफन करने की योजना पूर्व में बनी थी, उसे भी ओबामा प्रशासन ने रोक दिया है। इसका सीधा मतलब ये है कि अमेरिका के पास भी अभी तक कोई दूरगामी नीति नहीं है कि वो अपने परमाणु कचरे से कैसे पीछा छुड़ाएगा।

ये परमाणु कचरा भीषण विकिरण समाये रहता है और इसकी देखभाल हजारों बरसों तक करना जरूरी होती है। कुछ रेडियोधर्मी तत्वों के परमाणु संयोजन तो विघटित होने में लाखों वर्षों का समय भी लेते हैं। हर परमाणु संयंत्र से निकलने वाले कचरे को और इस्तेमाल हो चुके परमाणु ईंधन को मोटी-मोटी दीवारों वाले कंटेनरों में सील कर जमीन के भीतर गहरे रखा जाता है और ये एहतियात बरतनी होती है कि उनसे किसी किस्म का रिसाव न हो। अगर रिसाव होता है तो वह भूगर्भीय जल के साथ मिलकर असीमित तबाही मचा सकता है। रिसाव के कुछ हादसे हुए भी है लेकिन इस तरह के हादसों को छिपाया जाता है क्योंकि इनके पीछे कंपनियों का अस्तित्व टिका रहता है।

प्राथमिकता क्या है?
सवाल सिर्फ इतना है कि हमारी प्राथमिकता क्या है? वैज्ञानिक तरक्की और इंसान के अस्तित्व में से अगर चुनने का मौका आये तो क्या चुनेंगे? परमाणु ऊर्जा के लिए क्या हम उन्हीं जिंदगियों को दाँव पर लगाने को तैयार हैं जिनकी जिंदगी को आरामदेह बनाने के लिए हमें ऊर्जा चाहिए। जापान के प्रधानमंत्री ने हाल में कहा है कि परमाणु ऊर्जा के बारे में उन्हें पूरी तरह नये सिरे से सोचना शुरू करना होगा। वैसे भी यह एक मिथ्या प्रचार है कि परमाणु ऊर्जा प्रदूषणरहित होती है या वो सस्ती होती है। पुरानी कहावत है कि सस्ता है तो क्या जहर खा लें ! और ये तो सस्ता भी हर्गिज नहीं। परमाणु संयंत्र के परमाणु कचरे का निपटारा किसी भी और प्रदूषण से ज्यादा खतरनाक होता है और अगर इस कचरे के निपटान की लागत व परमाणु संयंत्र की उम्र खत्म होने के बाद उसके ध्वंस (डीकमीशनिंग) की लागत भी परमाणु संयंत्र में जोड़ दी जाए तो ये किसी भी अन्य जरिये से ज्यादा महँगी पड़ती है।

जहाँ तक ऊर्जा की कमी का सवाल है, ये ऊर्जा की उपलब्धता से कम और उसके असमान वितरण से अधिक जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों वैज्ञानिक डाॅ. विवेक मोंटेरो ने इसका खुलासा करते हुए बताया कि मुंबई में एक 27 मंजिला मकान है जिसमें एक परिवार रहता है और इसमें हैलीपैड, स्वीमिंग पूल आदि तरह-तरह की सुविधाएँ मौजूद हैं। इस बंगले में प्रति माह 6 लाख यूनिट बिजली की खपत होती है। ये बंगला अंबानी परिवार का है। दूसरी तरफ शोलापुर में रहने वाले दस हजार परिवारों की कुल मासिक खपत भी 6 लाख यूनिट की है। अगर देश में बिजली की कमी है तो दस हजार परिवारों जितनी बिजली खर्च करने वाले अंबानी परिवार को तो सजा मिलनी चाहिए लेकिन उल्टे अंबानी को इतनी ज्यादा बिजली खर्च करने पर सरकार की ओर से कुल बिल पर 10 प्रतिशत की छूट भी मिलती है।

जर्मनी में उन संयंत्रों को डीकमीशन करने पर भी विचार चल रहा है जो पहले से मौजूद हैं। बहुत से देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों पर शोध को प्रोत्साहन पहले से ही दे रहे हैं। वैसे भी परमाणु ऊर्जा में भी पानी की खपत बेतहाशा होती है क्योंकि रिएक्टर को ठंडा रखने के लिए मुख्य रूप से पानी ही इस्तेमाल किया जाता है। पानी की उपलब्धता के कारण ही परमाणु संयंत्र समुंदर या नदी के किनारे लगाये जाते हैं ताकि पानी की कमी न पड़े लेकिन इसी वजह से परमाणु संयंत्रों पर वो सारे खतरे बढ़ भी जाते हैं जो नदी में बाढ़ से हो सकते हैं या समुद्र में तूफान, सूनामी से। जैतापुर परमाणु संयंत्र में रोज करीब 5500 करोड़ लीटर पानी चाहिए होगा जिसे इस्तेमाल के बाद वापस समुद्र में फेंका जाएगा जिससे समुद्र का पूरा जैव संतुलन भी बिगड़ सकता है।

बेशक परमाणु संयंत्र से होने वाले रिसाव या दुर्घटना से लोग एक झटके में नहीं मारे जाते जैसे परमाणु बम से मरते हैं लेकिन परमाणु संयंत्र से जो विकिरण फैलता है वो परमाणु बम से फैलने वाले विकिरण की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है। और हजारों-लाखों वर्षों तक उसका विकिरण समाप्त नहीं होता। अगर हिरोशिमा-नागासाकी ने हमें ये सिखाया था कि हम परमाणु बम से तौबा करें वैसे ही फुकुशिमा से हमें ये सीख लेना चाहिए कि परमाणु ऊर्जा थोड़ी-बहुत विज्ञान समझने या प्रयोगशालाओं के भीतर प्रयोग करने के लिए ही ठीक है। जब तक हमें ये न पता हो कि किसी काम के परिणाम को हम कैसे सँभालेंगे, हम उसे कैसे शुरू कर सकते हैं। और परमाणु ऊर्जा में सिर्फ ऊर्जा नहीं, बल्कि भीषण विकिरण और विकिरणयुक्त कचरा भी है। जैतापुर संयंत्र को रोकना जनता, पर्यावरण और इंसानियत - तीनों के लिए जरूरी है। जनता के पक्ष में इसके दीर्घकालीन वैज्ञानिक व राजनीतिक मायने भी होंगे।

-विनीत तिवारी

  स्रोत - http://loksangharsha.blogspot.com/2011/06/blog-post_28.html

परम ऊर्जाः चरम विनाश



परमाणु आयोग की योजना इस अत्यंत जहरीले कचरे को कांच में बदल कर एक ही जगह स्थिर कर देने की है। इस कांच बने कचरे को विशेष प्रकार के शीतगृह में 20 साल तक रखा जाएगा। फिर अंत में उसे किसी ऐसी जगह रखना होगा जहां पानी, भूचाल, युद्ध या तोड़-फोड़ की कोई भी घटना हजारों साल तक उसे छेड़ न सके।
परमाणु समझौते को लेकर देश में चल रही बहस में ‘बिजली और बम’ की चिंता प्रमुख है। कहा जा रहा है कि अमेरिका के साथ हुए समझौते ने हमारे लिए फिर से परमाणु बिजली बनाने का दरवाजा खोल कर हमारा बम बनाने का रास्ता बंद कर दिया है। लेकिन देश में कुछ अपवाद छोड़ दें तो किसी ने भी परमाणु बिजली पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है। आज दो-चार पीढ़ियों को कोयले के मुकाबले बेहद साफ सुथरी बिजली, प्रकाश देने के आश्वासन पर यह आने वाली सैकड़ों पीढ़ियों को भयानक अंधकार में धकेल देगी। अभी तो हम प्लास्टिक का कचरा भी ठिकाने नहीं लगा पाए हैं, परमाणु बिजली के भयानक कचरे को भला कैसे संभाल पाएगें। आज से कोई 21 वर्ष पहले लिखा यह लेख आंकड़ों के हिसाब से पुराना, अधूरा भले ही हो, परमाणु ऊर्जा के खतरों पर एकदम नया प्रकाश डालता है।

सन् 1945 में श्री होमी भाभा ने देश के लिए ‘असीम’ परमाणु ऊर्जा की संभावना का संकेत दिया था। तभी से इस संभावना को सच करने का सपना शुरू हुआ। आज देश में कोई अरबों रुपयों का परमाणु साम्राज्य फैला हुआ है, जिसमें यूरेनियम की खदान, ईंधन निर्माण के कारखाने, भारी पानी संयंत्र, परमाणु बिजली घर और काम आ चुके ईंधन को फिर से उपचारित करने के संयंत्र आदि शामिल हैं। देश के पांचवें परमाणु रिएक्टर का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि, “कुछ राष्ट्र हमें प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में मजबूत नहीं बनने देना चाहते थे... पर यह सफलता हमारे स्वावलंबी होने के संकल्प का प्रमाण है।” मद्रास एटमिक पावर प्रोजेक्ट की उस पहली इकाई के 90 प्रतिशत कलपुर्जे देशी बताए गए थे।

परमाणु ऊर्जा आयोग एक ऐसा सरकारी संगठन है, जिसे धन की कमी कभी नहीं पड़ी। हर एक पंचवर्षीय योजना में ऊर्जा विभाग के हिस्से का 2 से 5 प्रतिशत तक इस आयोग को जाता रहा है। केंद्र सरकार के सालाना बजट में ऐसे शोध और विकास कार्य के लिए रखी जाने वाली कुल राशि का भी कोई 15 से 25 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा को दिया जाता है।

परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बल पहुंचाने वाले अनेक सहायक संगठन देश भर में फैले हुए हैं। सबसे पुराना और अत्यंत गौरवशाली माना गया परमाणु संस्थान ट्रांबे का भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र है। यह देश में हल्के और भारी पानी रिएक्टरों के शोध का संस्थान है। यहां से अन्य कोई शोध-रिएक्टरों का संचालन भी होता है। देश का दूसरा परमाणु अनुसंधान केंद्र मद्रास के पास कलपक्कम का ‘रिएक्टर रिसर्च सेंटर’ है, जिसने मुख्य रूप से फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

यूरेनियम का खनन बिहार के सिंहभूम के पास जादूगोड़ा में भारतीय यूरेनियम निगम करता है। खदान और उसकी सहायक मिलों की क्षमता रोजाना 1,000 टन यूरेनियम को उपचारित करने की है। निगम नखापहाड़ और तुरमडीह में दो और खदानें जल्दी ही शुरू करने की तैयारी कर रहा है। ये दोनों जमशेदपुर के पास हैं। इन पर कोई 100 करोड़ रुपए लगाने वाले हैं। इनसे नए परमाणु बिजली घरों के लिए ईंधन की आपूर्ति हो सकेगी। खदान से निकले यूरेनियम को हैदराबाद के पास बने परमाणु ईंधन समवाय को भेजा जाता है, जहां कोटा और कलपक्कम के परमाणु रिएक्टरों के लिए ईंधन की छड़ें बनाने के लिए उसे तोड़कर टिकियां बनाई जाती हैं और फिर उन्हें जिर्कोलॉय ट्यूबों में भरा जाता है। जिर्कोलॉय का निर्माण केरल से मंगाए गए जिरकोनियम रेत से किया जाता है। तारापुर के हल्के पानी के रिएक्टरों के लिए परिष्कृत यूरेनियम बाहर से आता है और यहां उसे तोड़ा जाता है।

तारापुर के रिएक्टरों को छोड़कर बाकी सभी कार्यरत और निर्माणाधीन रिएक्टर ‘केंडु’ (केनेडियन ड्यूटेरियम टाईप) नमूने के हैं। ये भारी पानी का उपयोग करते हैं। इनमें खासी पूंजी लगती है। फिर भी परमाणु ऊर्जा आयोग ने केंडु रिएक्टर ही पसंद किए हैं। उसमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन के रूप में काम आता है और इसका निर्माण देश में ही किया जा सकता है। इससे विदेशों से ईंधन मांगने की झंझट से छुटकारा मिल सकता है और उस अंतर्राष्ट्रीय दबाव से भी मुक्ति मिल सकती है, जिसका सामना तारापुर के परिष्कृत यूरेनियम ईंधन के मामले में करना पड़ा है।

लेकिन यह उपाय तभी सफल होगा जब देश पर्याप्त भारी पानी तैयार कर ले। आज तीन जगह-नांगल (14 टन), वड़ोदरा (67 टन) और तूतिकोरिन (71 टन) में भारी पानी संयंत्र हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 150 टन सालाना की है। कोटा में (100 टन) औ तलसचर (62 टन) में दो और संयंत्र लगाने की तैयारी हो रही है। इन पांच संयंत्रों पर देश ने 220 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। थाल (110 टन) तथा मनुगुरु (185 टन) में दो और बड़े संयंत्र तैयार हो रहे हैं, जिन पर क्रमशः 188 करोड़ और 422 करोड़ रुपए खर्च होंगे। ऐसा ही एक तीसरा संयंत्र हजीरा में भी स्थापित करने की बात सोची जा रही है।

इस तरह देश के परमाणु बिजली कार्यक्रम का मूल आधार भारी पानी बनता जा रहा है। कोटा के संयंत्र के सिवाय बाकी सभी संयंत्र विदेशी ठेकेदारों की मदद से बने हैं। नांगल का निर्माण पश्चिम जर्मनी के ठेकेदारों ने किया था। वड़ोदरा और तुतिकोरिन के संयंत्र स्विट्जरलैंड की एक तथा फ्रांस की दो कंपनियों के मिले-जुले दल ‘गेलप्रा’ ने तैयार किए थे। वड़ोदरा, तूतिकोरिन और तलचर के संयंत्र अमोनिया-हाइड्रोजन की अदला-बदली वाली प्रक्रिया से और आगे-पीछे रासायनिक खाद कारखानों के साथ मिल कर काम करते हैं। इस प्रक्रिया से काम करने वाला संयंत्र दुनिया में सिर्फ एक और है। यह फ्रांस के माझिंगरबे नामक स्थान में है। उसका निर्माण भी गेलप्रा ने किया था। उसने 1968 से बस 1972 तक ही काम किया। इस प्रकार तूतिकोरिन और तलचर के संयंत्र एक विवादास्पद पद्धति से बनाए गए हैं।

दुनिया का अधिकांश भारी पानी अमेरिका और केनडा में हाइड्रोजन सल्फाइड/पानी की अदला-बदली वाली प्रक्रिया से तैयार होता है। पर अमेरिका और केनडा उसे बनाने का तरीका भारत को देना नहीं चाहते थे। इसलिए देश के इंजीनियरों को उस प्रक्रिया की रूपरेखा खुद ही बना लेनी पड़ी। अग्रगामी परियोजना बनाकर छोटी मात्रा में उसके निर्माण का तजुर्बा लिए बगैर ही कोटा में 100 टन क्षमता का संयंत्र बना लिया गया।

नांगल के बहुत ही छोटे-से संयंत्र को छोड़कर भारी पानी के बाकी सभी संयंत्र संकट में है। डिजाइन में गलती रह जाने के कारण वड़ोदरा के संयंत्र में 1977 में परीक्षण के समय विस्फोट हो गया था और उसे फिर 1981 तक खाली रखना पड़ा। फिलहाल संयंत्र ठीक से काम कर रहा है। लेकिन क्षमता का आधे से कम ही काम हो रहा है। कोटा के संयंत्र में व्यावसायिक स्तर पर काम अभी शुरू हुए चार वर्ष ही हुए हैं, फिर भी समस्याएं आने लगी हैं। तलचर के संयंत्र में दो साल की देरी की गई क्योंकि उसमें दो एक्सचेंज टावर नहीं थे। बताया जाता है कि 1975 में पश्चिम जर्मनी से जहाज द्वारा लाते समय पुर्तगाल के पास समुद्र में वे कहीं खो गए। 66 करोड़ रुपए के इस संयंत्र का निर्माण 1972 में शुरू हुआ था। तूतिकोरिन के संयंत्र ने 1978 और 1979 में कुछ हफ्ते ही काम किया, फिर तकनीकी खराबी तथा श्रमिकों के झगड़े के कारण बंद हो गया। आयोग के अनुसार 1983-84 में उसने एक तिहाई क्षमता तक काम किया और अब बिल्कुल अच्छा काम कर रहा है। भारी पानी के इन चार बड़े संयंत्रों की कुल क्षमता सालाना 301.2 टन की होते हुए भी इसने सालाना 14 टन क्षमता के छोटे-से नांगल संयंत्र से भी कम काम किया।

परमाणु बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला भयानक जहरीला रेडियमधर्मी कचरा परमाणु उद्योग के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। उस कचरे को न केवल प्लूटोनियम से अलग करते समय बेहद सावधानी के साथ संभालना पड़ता है, बल्कि हजारों साल तक उसके भंडारण का इंतजाम भी करना पड़ता है।
परमाणु बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला भयानक जहरीला रेडियमधर्मी कचरा परमाणु उद्योग के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। उस कचरे को न केवल प्लूटोनियम से अलग करते समय बेहद सावधानी के साथ संभालना पड़ता है, बल्कि हजारों साल तक उसके भंडारण का इंतजाम भी करना पड़ता है। अनेक लोगों का मानना है कि इस समस्या का कोई भी समाधान नहीं है।

आयोग की योजना कचरे के उपचार वाले संयंत्रों को परमाणु बिजली घरों के पास ही बनाने की है ताकि इस खतरनाक चीज को दूर-दूर तक ले जाने का काम कम ही हो सके।

एक बार प्लूटोनियम को अलग कर लेने के बाद परमाणु आयोग की योजना इस अत्यंत जहरीले कचरे को कांच में बदल कर एक ही जगह स्थिर कर देने की है। इस कांच बने कचरे को विशेष प्रकार के शीतगृह में 20 साल तक रखा जाएगा। फिर अंत में उसे किसी ऐसी जगह रखना होगा जहां पानी, भूचाल, युद्ध या तोड़-फोड़ की कोई भी घटना हजारों साल तक उसे छेड़ न सके। पर ऐसी जगह मिलना मुश्किल है। हिमालय, सिंधु-गंगा के कछार, थार रेगिस्तान और दक्षिणी पठार आदि भूजल की अधिकता या भूचाल की संभावना जैसे कारणों के आधार पर रद्द किए जा चुके हैं। लेकिन परमाणु ऊर्जा आयोग के वैज्ञानिक मानते हैं कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और उससे लगे आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ जिलों का कंकरीला पठार इसके लिए उपयोगी हो सकता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के इलाकों की भी जांच हो रही है। बंगलूर के पास कोलार की खदान के काम में न लाए गए हिस्सों में एक प्रायोगिक शोध केंद्र भी स्थापित किया गया है। इस कचरे के स्थायी निपटान के लिए एक भंडार घर तैयार करने की बात भी सोची जा रही है।

निरापद कोई जगह मिल भी गई तो जरा सोचिए कि वहां हजारों साल तक उसकी सुरक्षा करने के लिए देश को किस तरह के राजनैतिक, सैनिक ढांचे की जरूरत पड़ेगी! क्या ढांचा हमारे लोकतंत्र में निभ पाएगा?

फिर भी अगर देश की अगली शताब्दी में परमाणु बिजली की पूरी आवश्यकता का एक समुचित हिस्सा भी ठीक से उत्पादन करना है, जो दसियों हजार मेगावाट होगा, तो गैर-प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन वाला पद्धति को अपनाना ही होगा।

  लेखक: अनिल अग्रवाल और प्रफुल्ल बिदवई  

 सितम्बर-अक्टूबर 2008, गांधी मार्ग






परमाणु ऊर्जा के प्रसार के खतरे




यह समय सिद्ध है कि परमाणु ऊर्जा न तो साफ सुथरी है और न ही सस्ती! इसके अलावा दुर्घटना की स्थिति में होने वाले विनाश का आकलन कर पाना भी कठिन है। इसके विकिरण सैकड़ों-हजारों वर्षों तक पर्यावरण में विद्यमान रहेंगे और मानवता को नुकसान पहुंचाते रहेंगे। भारत के राजनीतिज्ञों ने परमाणु ऊर्जा विकास को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और देश की सुरक्षा को दरकिनार कर दिया है। 

लेखक -  भारत डोगरा 

भारत सरकार परमाणु ऊर्जा के तेज प्रसार का निर्णय ले चुकी है। नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से अभी तक हम जितनी बिजली पूरे देश में प्राप्त कर सके हैं, उससे कहीं अधिक बिजली निकट भविष्य में मात्र एक परियोजना, महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के रत्नागिरी जिले में स्थित जैतापुरा जहां 1650 मेगावाट के छः सयंत्र लगाने से अथवा 9900 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता से प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। इस विशालकाय परियोजना का विरोध वैसे तो स्थानीय लोग आरंभ से कर रहे हैं, पर जापान के फुकुशिमा हादसे के बाद इस विरोध ने और अधिक जोर पकड़ा है। वैश्विक जन-विरोध को फुकुशिमा के बाद बेहतर समझा जा रहा है और उसे अधिक व्यापक समर्थन मिल रहा है। परंतु महाराष्ट्र सरकार के दृष्टिकोण में बहुत कम परिवर्तन आया है। वह इस परियोजना को हर हालत में आगे ले जाने के लिए तैयार लगती है। भारत सरकार के दृष्टिकोण में बस इतना सा फर्क आया है कि सुरक्षा पक्ष को थोड़ा सा और पक्का कर दिया जाए। स्थानीय लोग इतने से ही संतुष्ट नहीं हैं एवं वे इस परियोजना को रोकना चाहते हैं। स्थानीय संगठनों का यह विरोध सुरक्षा, आजीविका, पर्यावरण की रक्षा के लिए है जबकि राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए शिवसेना ने अलग से इस आंदोलन को राजनीतिक रंग दे दिया है।

सरकार और स्थानीय लोगों में परमाणु संयंत्रों संबंधी सोच में बुनियादी विरोध के कारण यहां बार-बार टकराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस तरह के परमाणु संयंत्रों के बढ़ते विरोध के समाचार हरियाणा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों से भी मिलते रहे हैं जहां नए परमाणु संयंत्र प्रस्तावित हैं। तिस पर मुद्दा केवल स्थानीय लोगों के विरोध का नहीं है। कई ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ व यहां तक कि सरकार में जिम्मेदार पदों पर कार्य कर चुके विशेषज्ञ भी जैतापुर परियोजना के विरुद्ध आवाज उठा चुके हैं। साथ ही इन विशेषज्ञों ने परमाणु ऊर्जा के तेज प्रसार के विरुद्ध भी चेतावनी भी दी है।

फुकुशिमा हादसे ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि परमाणु ऊर्जा के संयंत्रों की दुर्घटनाएं कितनी गंभीर हो सकती हैं, उनसे कितनी व्यापक व दीर्घकालीन क्षति हो सकती है। चेरनोबिल दुर्घटना के असर के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ की परमाणु विकिरण पर गठित वैज्ञानिक समिति ने बताया है कि इसके कारण कैंसर के 34000 से 140000 अतिरिक्त मामले सामने आए, जिनसे 16000 से 73000 मौतें हुईं। चेरनोबिल दुर्घटना के बाद पश्चिमी यूरोप में कोई भी नया परमाणु बिजली संयंत्र नहीं स्थापित किया गया। जर्मनी ने यहां तक कहा कि जो परमाणु संयंत्र पहले से स्थापित किए गए हैं उन्हें निश्चित समय अवधि में हटाया जाना चाहिए। यूरोपीयन यूनियन में जहां वर्ष 1979 में 177 परमाणु ऊर्जा संयंत्र सक्रिय थे वहां इस समय मात्र 143 संयंत्र सक्रिय हैं।

परमाणु बिजली उद्योग ने यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया है कि चेरनोबिल व फुकुशिमा अपवाद हैं तथा परमाणु संयंत्रों में गंभीर दुर्घटना की संभावना बहुत कम है। पर यह भ्रामक प्रचार है क्योंकि मेल्टडाऊन के साथ अन्य गंभीर दुर्घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो ऐसी काफी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इन दुर्घटनाओं का आकलन किसी देश या दुनिया के स्तर पर रिएक्टर वर्ष के आधार पर किया जाता है। रिएक्टर वर्ष का अर्थ है कि जितने परमाणु वर्ष हैं उसे उनकी कार्य अवधि के वर्षों से गुणा कर दिया जाए। जाने माने वैज्ञानिक एम.वी. रमना ने हाल में अनुमान प्रस्तुत किया कि 1400 रियक्टर वर्ष में एक गंभीर दुर्घटना की संभावना है। इसका अर्थ यह हुआ कि 437 रिएक्टरों वाले हमारे विश्व में लगभग तीन वर्षों में एक गंभीर दुर्घटना की संभावना है। छोटी दुर्घटनाएं तो कहीं अधिक होती हैं और ये भी कई लोगों के लिए काफी दर्दनाक हो सकती हैं।

हाल में फुकुशिमा में हुई दुर्घटना के समय देखा गया कि एक देश में होने वाली ऐसी दुर्घटना से नजदीक के अन्य देशों में भी दहशत फैल सकती है। उच्च कोटि की तकनीक उपलब्ध होने पर भी इन दुर्घटनाओं को रोक पाने या नियंत्रित कर पाने की कोई गारंटी नहीं है। इनके दुष्परिणाम बहुत दीर्घकालीन होते हैं व कुछ परिणाम जैसे बच्चों के जन्म के समय उपस्थित होने वाली विकृतियां तो बहुत दर्दनाक होती हैं।

इसके अतिरिक्त यूरेनियम के खनन से लेकर परमाणु ऊर्जा के उत्पादन की प्रक्रिया से जनित अवशेष पदार्थों को ठिकाने लगाने की लगभग सभी प्रक्रियाएं तरह-तरह के जोखिमों से भरी हुई हैं। खतरनाक अवशेष पदार्थों के बारे में संतोषजनक समाधान तो अभी किसी के पास नहीं है।

विभिन्न खतरों के बारे में परमाणु बिजली उद्योग का कहना है कि तरह-तरह की नई तकनीकों और सुधारों से सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर किया जा रहा है। पर परमाणु संयंत्रों से जुड़ी दुर्घटनाओं की संभावना कुछ ऐसी है कि इन सुधारों से भी संतोषजनक समाधान अभी नहीं मिल रहा है। फिर यह बताना भी जरूरी है कि जैसे-जैसे सुरक्षा उपायों का खर्च बढ़ता है वैसे-वैसे परमाणु बिजली अधिक महंगी होती जाती है। जहां एक समय परमाणु ऊर्जा को अपेक्षाकृत सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था वहीं आज यह एक महंगा स्रोत बन चुका है। जैतापुर में लगने वाले रिएक्टर की पूंजी लागत 5000 डालर प्रति किलोवाट आंकी जा रही है जबकि कोयले आधारित तापघर की लागत 1000 डालर प्रति किलोवाट होती है।

देश के जाने माने परमाणु विशेषज्ञ गोपालकृष्णन परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के शीर्ष के पदों पर रह चुके हैं। उन्होंने कहा है कि जैतापुर में जो ईपीआर संयंत्र लगाए जा रहे हैं वे पहले कहीं कमीशन नहीं किए गए हैं अतः उनकी संभावित समस्याओं के बारे में अभी इन्हें बनाने वाली कंपनी अरेवा को भी पता नहीं है। इसके अवशेष पदार्थों को विशेष व अधिक कठिन समस्याओं से भी जूझना पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा कि यह बहुत महंगी तकनीक है जबकि इससे सस्ती तकनीक हमें उपलब्ध है।

हाल ही में देश के 60 से भी अधिक बुद्धिजीवियों ने सरकार को जैतापुर परमाणु संयंत्र को मंजूरी देने में किसी भी तरह की हड़बड़ी से बचने की सलाह दी है। पूव नौसेना प्रमुख एडमिरल एल. रामदास, एम.वी. रमना व पी. के. भार्गव जैसे विख्यात वैज्ञानिकों की इस चेतावनी पर सरकार को समुचित ध्यान देना चाहिए।

श्री भारत डोगरा प्रबुद्ध एवं अध्ययनशील लेखक हैं।

लेख साभार - http://www.hindi.indiawaterportal.org/node/30718